
थर्टी पर्सेंट की राशि पर वर्चस्व जमाने के लिए चाईबासा में तैनात डीएचओ (जिला पशुपालन अधिकारी) और रांची के डोरंडा में तैनात पशुपालन निदेशालय के एक वरीय अधिकारी में अनबन नहीं होती तो चारा घोटाला उजागर नहीं होता। वर्ष 1984 में ही छोटे स्तर पर चारा घोटाले की शुरुआत हो चुकी थी। वेटरनरी इलाके से जुड़े नेताओं को भी इसकी भनक मिल गई थी और अपनी जरूरत के हिसाब से वे बड़े अधिकारी सिन्हा जी (श्याम बिहारी सिन्हा नहीं) से महीना- दर-महीना पैसा वसूलने लगे थे।
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